तुम्हारे प्यार में आज भी उतना ही पागल हूँ,
जितना बरसों पहले तुमसे मिलने के बाद हो गया था।
खो गया था तुम्हारी आंखों में,
शायद उसी दिन तुम्हारा हो गया था।
तुम मेरे जीवन का वो उजाला हो जो अंधेरी रात में
जुगनू की तरह मुझे जिंदगी का रास्ता दिखा रहा है।
तुम वो प्रेरणा हो
जिससे मेरे जीने की इच्छा को ईंधन मिल रहा है।
सच कहूं तो मेरी मंजिल भी तुम, मेरा रास्ता भी तुम हो,
मेरी चॉकलेट भी तुम और मेरा पास्ता भी तुम हो।
मेरे नीरस जीवन में रस भरने वाली
वो रसभरी भी हो तुम।
तुम वर्षा रितु की वो पहली फुहार हो..
जो तपती धरती को थाह देती है।
सूरज की वो पहली किरण भी हो तुम..
जो रात के घने अंधेरे को चुटकी में हर लेती है।
मैं तुलसीदास तो नहीं कि तुम्हारे प्रेम में
रामचरितमानस रच दूँ!
पर मेरे दिल की किताब का हर पन्ना,
तुम्हारे एहसानों की अमिट-गाथा है।
तुम्हारे बिना जीवन कुछ भी तो न था..
एक सूखा उपवन ही था।
इस बगिया की हरियाली हो तुम..
इस जीवन वृक्ष की अनमिट प्यास हो तुम..
सच कहूँ तो जिंदगी का खुशनुमा एहसास हो तुम।
तुम ही हो मेरी गौरी, तुम ही मेरी काली हो!
नि:शस्त्र हो कर भी परम शक्तिशाली हो,
तुम ही हो सर्वकामप्रदायिनी.. मेरी आराध्या!
अभिमान है मुझे कि तुम मेरी घरवाली हो।।