Saturday, 18 April 2020

ठहर जाओ! ऐ नफरत के सौदागरो

लॉक डाउन की सोशल डिस्टेंसिंग में 
सड़कें वीरान और सुनसान थी;
पुलिस किसी तरह सिस्टम को काबू किए थी;
उधर डॉक्टरों की टीम घर-घर जाकर, 
बचाव की कवायद कर रही थी;
देश की आवाम घरों में बैठकर 
सब की सलामती की इबादत कर रही थी। 

मगर उसी वक्त जमातियों की अन्धता व अज्ञानता;
और धर्मोन्मादियों अफवाह फैलाने वाली टोली,
समाज में नफरत का जहर भर रही थी! 
समाज को तोड़ने की नापाक कोशिश कर रही थी। 

असुरक्षा, अज्ञानता और अफवाहों के तेल में
नफरत के दीये जल रहे थे।
एक तरफ लोग कोरोना से मर रहे थे 
दूसरी तरफ हम सांप्रदायिकता से लड़ रहे थे।

डॉक्टरों की टीम पर हुआ पथराव 
इसी का एक अभूतपूर्व प्रतिकार था;
वरना इतिहास में ना हुआ 
कभी ऐसा कायराना वार था!
सबकी जान बचाने वाला भगवान ही हुआ 
इस जहर का शिकार था।

अब दुश्मन केवल वायरस नहीं 
बल्कि कई और दीख रहे थे; 
अज्ञानता, असुरक्षा, नफरत और 
सांप्रदायिकता जैसे दानव, 
भारत मां का हृदय चीर रहे थे।

जरूरत सोशल डिस्टेंसिंग की थी..
मगर तुमने दिलों में डिस्टेंस कर दी!
जब वक्त था साथ मिलकर वायरस से लड़ने का!
तुमने वायरस से मिलकर 
मानवता के खिलाफ ही साजिश रच दी!!

ऐ नफरत के सौदागरो, ठहर जाओ!
क्योंकि जब जंगल में आग लगेगी तो 
पेड़ सूखा भी जलेगा और हरा भी जलेगा।
बच्चा भी जलेगा और बूढ़ा भी जलेगा।
इस आग में रंग नारंगी भी जलेगा,
और हरा भी जलेगा।
आदमी छोटा भी जलेगा और बड़ा भी जलेगा।।

इसलिये ठहर जाओ... ठहर जाओ...!


मशाल मैन 


Sunday, 12 April 2020

हमारा घर बनाने वाले वो बेघर लोग!

क्या होता है घर? 
घर, सुकून का दूसरा नाम है, 
थकान के बाद का आराम है, 
घर, हमारी नादानियों का फ़ेवरिट स्थान है 
हमारी हक़ीकत की असली पहचान है.!!

घर नाम है...:
प्रेम और आनंद की फुहार का! 
क्रोध के स्वच्छंद गुबार का!
भावनाओं की अभिव्यक्ति 
और हृदय के निश्चल उद्गार का।

जिसे छुपा कर जाहिर करते हो तुम;
उस आलिंगन और प्यार का!
सच कहूं तो मोक्ष का भौतिक पर्याय है घर!! 
जीवन यात्रा का सुंदरतम पड़ाव है घर।

पर कभी सोचा तुमने उनके बारे में 
जिनका घर... कभी रैन बसेरा..
तो कभी फ्लाईओवर का अंडर पास है!
कभी म्युनसिपल्टी  का पार्क 
तो कभी बस शेल्टर की छांव है!

इधर.. आशियाने की तलाश है ..
उधर लोगों की शक भरी निगाह है। 
बेघर होना बदकिस्मती ही नहीं रहता
बन जाता एक गुनाह है!!

जिस मजदूर ने ठेकेदार को अमीर बनाया,
हम सब के लिए घर, आलीशान बनाया;
उसके पास ही नहीं उसका अपना घर है!
हाय! कितना बेरहम, कितना बेदर्द मेरा शहर है!!

लॉकडाउन में जब हम सब, 
अपने-अपने घरों में आराम कर रहे हैं।
हमारा घर बनाने वाले वो बेघर लोग...
सड़क पर महामारी से दो-दो हाथ कर रहे हैं!

हाय री नियति! 
ये तेरा कैसा कहर है?
सबके लिये घर बनाने वाला, 
यहां खुद ही बेघर है!!


मशालमैन 

देश के उन तमाम बेघर लोगों को समर्पित जो लॉकडाउन में भी खुली सड़कों पर हैं।  जब हम सब बीमारी से बचने के लिए अपने-अपने घरों में कैद हैं, उस वक्त भी ये बेघर लोग खुली सड़क पर महामारी के साथ द्वंद्व युद्ध (ambush) करने को मजबूर हैं।

Saturday, 11 April 2020

जल गया घर उनका!

महामारी में, जल गया घर उनका!
घर क्या जला , गांव ही जल गया 
सपने ही न जले..
सपनों का महल भी जल गया।

कोरोना के कहर से लड़ने को 
हर कोई घर में बंद था,
पर घर ही जल गया हो जिनका 
उनका क्या प्रबंध था??

सहसा लगी भीषण आग में 
बेघर हो गया पूरा गांव! 
वैशाख की तपती धूप में 
ढह गई उनके सिर की छांव!

एक ओर महामारी है, 
एक ओर आग का कहर है
अंगारों में धधक रहा, 
सपनों का शहर है  


पर सपनों को न जलने देना..!! 
कि बसते हैं सपनों से ही नए गांव!
सपनों से ही बसता हर शहर है!!

और कितना ही आलीशान क्यों ना हो..
दफन होता हर शहर है!


मातम पर ही सृजन की, 
इबारत लिखी जाती है।
देखो..! जलने ना देना अपने हौसलों को
कि.. हौसलों से ही तो, दुनिया जीती जाती है। 

जो आज है वो कल न था 
और जो आज नहीं, वो कल होगा..
तेरी उम्मीदों में कैद है, तस्वीर नये कल की!
तेरे आज से कहीं बेहतर, तेरा कल होगा!!

मशाल मैन

उत्तरकाशी के सवादी गांव में लगी भीषण आग के पीड़ितों को समर्पित।

Friday, 3 April 2020

मुर्दा आदम

महामारी से बचने को
कोई ताली बजा रहा था,
कोई थाली बजा रहा था.. 
तो कोई दीये जला रहा था।

धरती कांप रही थी, 
आसमान रो रहा था!
मौत के खौफ से..हर कोई 
भयभीत हो रहा था। 

सामने सूखे पत्तों की मानिंद,
यूरोप जल रहा था, 
पूरब तब भी मगर 
वोटों की खेती कर रहा था। 

ताली बज गई,
थाली फट गई!
दीये बुझ गए!!
दौड़ते भागते रास्ते...अचानक रुक गए!!!

अज्ञान और घृणा के अंधकार में, 
समरसता अस्त हो गई! 
लोगों को आपस में लड़ा कर, 
राजनीति मदमस्त हो गई।

सूने हो गए शहर..
लहूलुहान हुई गलियां सारी, 
नफरत के जहर के आगे.. 
छोटी पड़ गई महामारी!!

 अब न तो डॉक्टर की और न ही वैन्टिलेटर की
जरूरत थी, जिंदगी बचाने को। 
दो गज जमीन और चंद लकड़ियां ही काफी थी 
'मुर्दा आदम' को ठिकाने लगाने को!!


'मशालमैन'