Monday, 19 October 2015

एक गौभक्त का चरित्र

आश्विन माह में
चचा के धान के खेत में
गौमाता घुस कर
पके हुए चावल का आनंद ले रही थी,
चचा खबर लगते ही
लठ लेकर झट दौड़े,
हाथ पड़ी माता को खूब पीटा।
खाया पिया सब निकाल दिया
और परमानेंट खूंटे से बांध दिया।

सुना कि नेताजी के निवेदन पर
चचा आज धरने पे बैठे हैं ,
वो भी देश में जारी
गौहत्याओं के विरोध में।

रोज शाम एक पव्वा मुर्गा
और एक पव्वा दारू का
रेगुलर सेवन कर रहें हैं
अगले दिन पूरी निष्ठा के साथ
धरना कर रहे हैं।

गांव में हर किसी को
अपने गौमाता प्रेम से रिझा देते हैं
और जो विरोध करता है
उसे आँख दिखा देते हैं।

चचा गौभक्तों का असली चेहरा हैं
जो सुबह शाम
गाय का दूध चूस जाते हैं ,
और वो ना मिले तो गाय को
मरने के लिए सड़क पर छोड़ आते हैं।
अगले दिन दारू में सेट
धरने पे लेट जाते हैं!

गाय वाकई माता है !
जिन्दा है तो अपने बच्चों के हिस्से का
दूध हमें देती है ,
और मर गयी तो
ब्राह्मण को .......आमदनी
चर्मकार को चमड़ा
गरीबन को रोजगार और
नेताओं को वोट देती है।

दूसरे पाकिस्तान की तैयारी

बेशक लहू में डुबो दो
कातिलो मेरे बदन को
देना होगा तुम्हें ही ,
कन्धा मगर मेरे कफ़न को।
मातम आज मेरे घर है कल तुम्हारे घर होगा
हमें लड़ाने वाला न यहाँ है , न वहां होगा!!

वो रोटियां सेंक रहा है
हमारी बेवकूफी की,
सनक की!
क्या तुम्हें सपने में भी
चुनाव में
उसकी जीत की खनक थी?

पल भर में
तबाह कर दिया उसने
हमको, हमारे जज्बात को
बरसों के रिश्तों की गहरी गाँठ को

हम बर्बाद हुए वो आबाद हुआ,
कभी मुजफ्फरनगर तो कभी
जहानाबाद हुआ।
वो पनपता गया , हम उजड़ते गए,
वो लड़ाता गया, हम लड़ते गए।

चंद बरसों पीछे एक पाकिस्तान बनाया था उसने।
लगता है फिर कुछ ऐसा ही इरादा किया है उसने!
तो फिर क्या सोचा है तुमने ???

पीना दो मुझे और भूल जाने दो....

पीने दो मुझे!
भूल जाने दो ....
मेरी छद्म हकीकत को!
झूठी पहचान को !
और देख लो बगैर कपड़ों वाले
एक नंगे इंसान को।

जो बिल्कुल वैसा है
जैसे नन्हें बेअक्ल बच्चे
एकदम सहज
स्वछंद और मुक्त ,
झूठे प्रपंचों भेदभावों
और ऊंचनीचों से
एकदम कहीं दूर....
बामन चमार हिन्दू मुसलमान
यादव और जाट
सबसे दूर...
दूर नफरत की हर दीवार से
जो खड़ी की है
तुम कपड़े वाले धूूूर्त मानवों ने ।

मुक्त अविरल बहती नदी को
कैद करने वालों .......
संभल जाओ !
वरना दफन हो जाओगे
किसी रोज......एक दिन
अपने ही बनाए शमशानों में !

नरिया हलधर

नरिया राम हलिया या हलधर
मेरे दादा मास्टर बची राम जोशी का समकालीन
उनका अभिन्न कृषि मित्र,
वो हल चलाता मेरे दादा बीज़ छिड़कते
दोनों के एक-एक बैल मिलकर चल रही थी
दो घरों की काश्तकारी
या फिर रोजी रोटी ही।

वो आता जब कभी भी
मेरे गाँव के घर,
दरकिनार कर गद्देदार कुर्सियों की सेज को
बाध्य था, रखने को अपनी तशरीफ
मटियारी जमीन पर,
और धो जाता चाय पीकर
अपने ही हाथों अपना गिलास।

कारण पूछने पर माँ ने बताया कि
वो नीची जात का है
हम उसके हाथ का छूआ नहीं खाते पीते
और नहीं उसको छूते
‘अछूत है वो ……. अछूत’ !!

समय के साथ मैंने भी देखा दुनियाँ को
अपनी आँखों से
पढ़ा राजा राम मोहन, गांधी
पेरियार, ज्योतिबा और अंबेडकर को, खुली मेरे मन की आँखें
और मालूम हुई मुझे
मेरे ब्राह्मणवाद की
झूठी, खोखली और तर्कहीन हक़ीक़तें।

मेरे विशेष बुलावे पर
मेरी शादी में आया था नरिया,
मेरी शहरी और अनभिज्ञ पत्नी ने
उसके पाँव छू दिये तो
पूरा गाँव उसे घूरने और उलाहने लगा :
‘रे क्यों आ गया ब्राह्मणों के पवित्र काम काज में!
नीयत पड़ने लगी है अब तुम्हारी पके हुए अनाज में’

माँ ने आदेश दिया....
बहू को तुरंत नहाने का
कपड़े बदलकर मंदिर में जाने का
फिर पंडित ने शुद्धि कर्म किया
'गंगाजल और गौमूत्र' से
वधू को पवित्र किया !

मैं भी व्यवस्था का लाचार अंग-सा
बस देखता ही रह गया
कुछ न कर सका
बल्कि मेरे भीतर का क्षणिक फासीवाद तो
यहाँ तक कहने लगा
कि खामोखां ही बुला बैठा कमबख्त नरिया को।

पर मेरी स्मृति का अभिन्न हिस्सा है नरिया
मेरा प्रिय और सच्चा मित्र है
मेरे चाचा दादा और ताऊ सा ही है
फिर भी मेरे समाज का अछूत ही है नरिया !!

जो सम्मान मेरे दादा का था गाँव में
वही नरिया को दे दो,
फिर वापस ले लो
इसके बच्चों से आरक्षण,
वरना लेने दो इसे
अगली अनेक पुस्तों तक आरक्षण ॥

तमाम आत्ममुग्ध सवर्णो और
स्वघोषित प्रतिभाशालियों !
अभी तो इसे एक सम्मानित इंसान बनने में ही
सदियाँ लग जाएंगी।
फिर ये भी होने लगेगा तुम्हारी ही तरह
टैलेंटेड और कैपेबल !!

Saturday, 17 October 2015

गरीबी: एक अभिशाप

अपने भूखे बिलखते दुधमुँहें बच्चे को
पाँच साल की बेटी के हाथों में सौंपकर,
'मोतिया' भरी दुपहरी में गारा बना रही थी,
धूप उसके सलोने गात को करिया रही थी।
नन्हे बचवा की विटामिन डी की कमी पुरिया रही थी!

आदमी औरत दोनों जमे हैं
रेत सीमेंट का गारा बनाने में,
बीच वाली तीसरी बेटी मिटटी खाने में
और बड़ी वाली माँ-सी बचवा खिलाने में।

किसी तरह पूरा न कर पा रहा
जूझता बेबस परिवार
समय और समाज के हाथों लाचार
कर रहा अपनी रूह पर अत्याचार।

अचानक बादलों की गर्जना में हो सवार
हर तरफ बाढ़ का पानी बहने लगा अपार
बेघर होना ही था मोतिया का परिवार
एक दो नहीं, दिन हो गए पूरे इग्यार। 

भूख से बिलबिलाते बच्चों की
चीख सुनके भी नहीं पिघला ठेकेदार !
बोला गर मरो तो तुम मरो पर
मैं न दूंगा एक नया पैसा उधार!!

भूख के मारे जहर खाकर सो गया पूरा परिवार....
और बाढ़ के खाते में चढ़ गया ये नरसंहार....!
सो रहा विलायती रम के.......
............................   धुत नशे में ठेकेदार
कर रहा पर मन लगाकर नेताजी का वो प्रचार।।