Tuesday, 26 May 2020

भीख मांगना, नहीं हो सकता अपराध!

सुनने में आया है कि कोर्ट ने भीख मांगने को अपराध की श्रेणी में मानने से इनकार कर दिया है. वैसे हमारे विचार से भीख मांगने में इंसान को कोई मजा नहीं आता होगा.  कोई भी इंसान मजबूरी में ही भीख मांगता होगा. फिर दूसरी बात यह है कि भीख मांगना कोई इतना आसान काम तो नहीं भाई! भीख मांगने के लिए भी तो मेहनत करनी पड़ती है. दोपहर की धूप में चौमांस की बारिश में, कड़ाके की सर्दी में, शरीर पर बगैर कपड़ों के इधर से उधर घूमना और हर आते-जाते आदमी के आगे हाथ फैलाना, क्या यह कम मेहनत का काम है?? 

फिर हमारे देश में तो भीख मांगने को बड़ी ऊंची मान्यता है. आज से नहीं बल्कि सदियों से हमारे यहां साधु संन्यासी लगातार बड़े गर्व के साथ भीख मांगते चले आ रहे हैं. गाहे-बगाहे शादी बारातों में चले आने वाले पंडित जी का भी तो इनडायरेक्टली यही काम है. इन सबसे ऊपर एक बात यह भी है कि आखिर कौन भीख नहीं मांग रहा है इस दुनिया में??? हर आदमी तो भीख मांगी रहा है! नेता, जनता से वोट की भीख मांग रहा है और जनता नेता से अधिकार मांग रही है, थोड़ा बहुत काम भी मांग रही है ताकि उसे सड़क पर भीख ना मांगनी पड़े! ऑफिसों में देख लीजिए कर्मचारी, अधिकारियों से प्रमोशन मांग रहे हैं और अधिकारी-कर्मचारी से दुनिया भर का काम मांग रहे हैं, करने लायक भी और ना करने लायक भी! ऐसे में भला भीख मांगने को अपराध ठहराया जाना ठीक भी नहीं था. कोर्ट ने जो फैसला लिया है सही ही लिया है! 

अरे भाई! भूखे-प्यासे मरने से अच्छा तो भीख मांगना है ही!  और भिखारी क्या अपराध करता है? दिन भर मेहनत करता है, बेचारा सड़कों पर मारा मारा फिरता  है. कभी इस मोड़ से उस मोड़ तो कभी इस रेड लाइट से उस रेड लाइट और कभी इस चौराहे से उस चौराहे. कभी इस गाड़ी के आगे तो कभी उस गाड़ी के आगे और मजे की बात देखिए कि सौ लोगों के  भीख ना देने के बाद भी वह एक सौ एकवें आदमी के आगे उसी अधिकार, उसी साहस और उसी पुरुषार्थ के साथ हाथ फैलाता है. आखिर इसके बदले में उसको कुछ तो मिलना ही चाहिए. 

इतना चलना फिरने के कारण भिखारी को कभी डायबिटीज को नहीं होता पर फिर भी उसे स्वास्थ्य बीमा तो कराना ही पड़ता है क्योंकि कुछ हो या ना हो पर उसे कैंसर जरूर हो सकता है. वह चलते फिरते तंबाकू, बीड़ी और गुटखा वगैरा तो खाता ही रहता है, और कभी कभार शाम को 100 -200  रुपए क्वार्टर पर भी खर्च कर लेता है. लोग शराब की दुकान पर खड़े किसी भिखारी को  बड़ी बुरी नजर से देखते हैं और कहते हैं "यह देखो! यहीं खड़ा होकर दिनभर हमसे भीख मांगता है और रात को शराब की दुकान पर हमारे सामने हमसे अच्छी शराब खरीदता है!" पर एक बात सोचिए जब हम लोग नॉर्मल रूटीन वाले ऑफिस में वह भी  एयर कंडीशन में बैठकर टेंशन में आ जाते हैं और शाम को दो पैग लगाने से पीछे नहीं हटते  तो दिन भर धूप में धक्के खाने वाला, दर-दर की ठोकरें खाने वाला भिखारी..! उसे कितना टेंशन होता होगा? अगर वह कभी कबार बल्कि यूं कहिए कि अगर रोज भी एक क्वाटर पी ले रहा है तो इसे गलत नहीं समझा जाना चाहिए  भाई!

भिखारियों पर उंगली उठाने वाले बुद्धिजीवी और ज्ञानी लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भिखारी हमारी संस्कृति हैं. भिखारियों को हमने सदियों से पनाह दी है. और जिस तरह हमारे देश में रोजगार की निरंतर कमी हो रही है उसे देखते हुए हमें भविष्य में भी भिखारियों को ना केवल बर्दाश्त करना पड़ेगा बल्कि भीख मांगने को एक प्रोफेशन के रूप में भी मान्यता देनी  पड़ेगी. इसलिए हमें कोर्ट के फैसले की गहराई को समझना चाहिए और भीख मांगने को हमारे समाज का एक अनिवार्य पहलू मान लेना चाहिए. आखिर राहु केतु और शनि मंगल की दशाओं  से बचाव करने के लिए इन भिखारियों की भूमिका कुछ कम तो नहीं है! इसी बहाने सही, कुछ लोग भूखे मरने से तो बच रहे हैं, वरना यहां किसे पड़ी है गरीब जनता की..!

 मशाल मैन 

दलितों की यलगार

अरे गजब हो गया 'कमल'!
दलितों का आंदोलन हो गया. 
सदियों से कुचला जा रहा था जो,
सर नीचे करके ही चला करता था जो, 
जल, जंगल, जमीन सब से बेदखल था जो,
वह उठ खड़ा हुआ! 
उसने आवाज उठा दी!
उसने देहलीज पार कर दी!
उसने आंदोलन कर दिया.

अरे मालूम है तुमको  
जिसकी झोपड़ियां जलाया करते थे जमींदार,
सरेआम बसें फूंक दी उसने!
पंडितजी छूने से भी कतराते थे जिसे,
उस ने सरेआम सड़क पर 
उनकी झूठी आबरु को नंगा कर दिया.
अरे गजब हो गया,
दलितों का आंदोलन हो गया!

यूं तो हिंसा हो या आगजनी 
कभी काबिल-ए-तारीफ नहीं हो सकती.
मगर यह विद्रोह... 
एक नई मिसाल है!
शुरुआत है एक नए इतिहास की!
यह पुराने प्रतीकों की हार और 
नए दौर को गढ़े जाने के 
उन्माद का एहसास है.

पर यकीन मानिए, ये तो बस 
गूंगे के रोने की आवाज है,
'यलगार' अभी होना बाकी है
'कमल' ये तो बस आगाज़ है!

'मशालमैन'

Tuesday, 19 May 2020

जागो भारत! बुला रही है तुमको भारत माता...

नासिक से सतना जावे थी वो, पैदल अपने गांव!
अपने मटमैले आंचल से, दे रही गर्भ को छांव! 

चल रही धूप में बिना रुके, जल्दी पहुंचूं मैं गांव। 
शिशु ने आहट दी आने की, थम गए अचानक पाँव।

 प्रसव वेदना से चिल्लाई, ना था कोई सुनने वाला 
उस गरीब दुखियारी की, पीड़ा को हरने वाला! 

बच्चा जना सड़क पर माँ ने! अश्रु धार थी फूटी.. 
घबराहट में शिशु के जीवन की, आशा भी थी टूटी 

किंतु लाल था हिम्मतवाला, जरा देर ही रोया! 
मां के मटमैले आंचल से, उसने था मुंह धोया! 

माँ थी भूखी प्यासी लेकिन, ममता का दर्द हरा था..
दुग्ध धार फूटी स्तनों से, बालक का पेट भरा था। 

एक नुकीले पत्थर से फिर, जन्म नाल थी काटी! 
अपने बालक की नाभी, उसने जिह्वा से चाटी!!

बेहोशी आयी अखियन में, पर माता तनिक न सोई 
इसीलिए तो वंदनीय है, ना माता सा कोई !

उठा बांध चुनरी से शिशु को, चल दी माता अभिमानी!
ललना को पिलवाने उसकी, पितृभूमि का पानी।

बड़ी दूर थी मंजिल उसकी, सौ-सौ चलने थे मील!
मरदानी मां की छाया को, संग-संग उड़ते थे चील! 

पक्षी कलरव करते थे, वह लगती थी सेनानी!
पद चापों से धन्य हो रही, धरती हिंदुस्तानी!!

छाती से बांधे बालक को, जो मीलों दूर चली थी; 
एक मूर्ति लगा दो संसद में! उस माता महाबली की!

और नहीं है यह कोई, यह ही तो भारत माँ है 
इसका पूजन वंदन कर लो, ऐसा फिर पुण्य कहां है!

मंचों से जय-जय करने से, बस राजनीति ही होगी!
भारत मां की सच्ची जय तो, इस मां की जय ही होगी!

ऐसी कितनी ही भारत माँ, जब मरती है सड़कों पे! 
सोया रहता है एक भारत, तब अपने ऊंचे महलों में!

जागो भारत बुला रही है! तुमको भारत माता।
सड़कों पर हो रहा प्रसव भी, क्या तुमको जगा न पाता?

मशालमैन 


Sunday, 17 May 2020

मृत्यु क्या है?

मृत्यु अंतिम सत्य है क्या?
नहीं......तो?
एक बिन्दु है निर्माण और विघटन की प्रक्रिया का.
तुम्हारे पुनः अस्तित्व में विलीन हो जाने का.
और फिर सृजन के द्वार तलाशने का.

फिर किसी जीवन को पाने का या फिर. 
किसी और को जिलाने का!

उस 'बैक्टीरिया' का जिस्म बन जाने का
जो घुस जया करता था कभी तुम्हारे इसी जिस्म में।  
चक्र की इन अवस्थाओं में 
अंतिम सत्य कुछ भी नहीं... 
सब कल्प है 
सब गल्प है..

Tuesday, 12 May 2020

सिर्फ ए..क मदर्स डे!!

वो कौन है...
जो मां को याद करने के लिए 
मदर्स डे का इंतजार करता है?
वो कौन है जो मां को..
बस एक दिन प्यार करता है?


मां! तुम मेरी रगों में हो.. 
मेरे लहू में हो.. 
मेरे कतरे कतरे में...
मेरे जर्रे-जर्रे में तुम हो .
मैं तुम्हें याद करने के लिए 
एक 'डे' नहीं बना सकता!

तुम हर पल, हर वक्त मेरे साथ हो.
जो कुछ तुमने मुझे दिया है..
जो कुछ तुमने मेरे लिए किया है..
अफसोस! मैं  उसे चुका तो नहीं सकता!

पर मैं तुम्हें याद करने के लिए 
'सिर्फ ए..क मदर्स डे' नहीं मना सकता!!

Monday, 11 May 2020

मैं ही पटरी बिछाता हूं, मैं ही पटरी पे आता हूं!!


तुम्हारे घर बनाता हूं, मैं अपने पसीने से।
तुम्हारी नींव को छत पर चढ़ा देता हूं जीने से 
कि तपती धूप में जलकर महल सबके बनाकर भी 
मैं बाहर आ नहीं पाता हूं, उस छप्पर पुराने से!!

मैं वो हूं जो पुलों के टूटने पर दबके मरता हूँ !
कभी मैं बाढ़ के पानी में अपनों संग बहता हूँ !
नहीं मिलता सुकूं मुझको, कभी ताउम्र दुनिया में!
कभी गर्मी से जलता हूँ ! कभी सर्दी से मरता हूँ!!

कि सरपट दौड़ते हो जिनपे, वो सड़कें बनाता हूं  
हजारों मील अपने गाँव, पर पैदल ही..जाता हूँ 
मुझे क्या धौंस देते हो! तुम्हारी रेलगाड़ी की
मैं ही पटरी बिछाता हूं, मैं ही पटरी पे आता हूं!!

बड़ी आशाओं से तुमको, मैं गद्दी पर बिठाता हूं। 
मगर हर बार ही खुद को, ठगा हुआ सा पाता हूं।
 कि बचकर मुझ गरीबा से, कहां जाओगे ओ शाहो! 
मैं जो डोली उठाता हूं! तो अर्थी भी उठाता हूं!!