आश्विन माह में
चचा के धान के खेत में
गौमाता घुस कर
पके हुए चावल का आनंद ले रही थी,
चचा खबर लगते ही
लठ लेकर झट दौड़े,
हाथ पड़ी माता को खूब पीटा।
खाया पिया सब निकाल दिया
और परमानेंट खूंटे से बांध दिया।
सुना कि नेताजी के निवेदन पर
चचा आज धरने पे बैठे हैं ,
वो भी देश में जारी
गौहत्याओं के विरोध में।
रोज शाम एक पव्वा मुर्गा
और एक पव्वा दारू का
रेगुलर सेवन कर रहें हैं
अगले दिन पूरी निष्ठा के साथ
धरना कर रहे हैं।
गांव में हर किसी को
अपने गौमाता प्रेम से रिझा देते हैं
और जो विरोध करता है
उसे आँख दिखा देते हैं।
चचा गौभक्तों का असली चेहरा हैं
जो सुबह शाम
गाय का दूध चूस जाते हैं ,
और वो ना मिले तो गाय को
मरने के लिए सड़क पर छोड़ आते हैं।
अगले दिन दारू में सेट
धरने पे लेट जाते हैं!
गाय वाकई माता है !
जिन्दा है तो अपने बच्चों के हिस्से का
दूध हमें देती है ,
और मर गयी तो
ब्राह्मण को .......आमदनी
चर्मकार को चमड़ा
गरीबन को रोजगार और
नेताओं को वोट देती है।
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