Monday, 19 October 2015

नरिया हलधर

नरिया राम हलिया या हलधर
मेरे दादा मास्टर बची राम जोशी का समकालीन
उनका अभिन्न कृषि मित्र,
वो हल चलाता मेरे दादा बीज़ छिड़कते
दोनों के एक-एक बैल मिलकर चल रही थी
दो घरों की काश्तकारी
या फिर रोजी रोटी ही।

वो आता जब कभी भी
मेरे गाँव के घर,
दरकिनार कर गद्देदार कुर्सियों की सेज को
बाध्य था, रखने को अपनी तशरीफ
मटियारी जमीन पर,
और धो जाता चाय पीकर
अपने ही हाथों अपना गिलास।

कारण पूछने पर माँ ने बताया कि
वो नीची जात का है
हम उसके हाथ का छूआ नहीं खाते पीते
और नहीं उसको छूते
‘अछूत है वो ……. अछूत’ !!

समय के साथ मैंने भी देखा दुनियाँ को
अपनी आँखों से
पढ़ा राजा राम मोहन, गांधी
पेरियार, ज्योतिबा और अंबेडकर को, खुली मेरे मन की आँखें
और मालूम हुई मुझे
मेरे ब्राह्मणवाद की
झूठी, खोखली और तर्कहीन हक़ीक़तें।

मेरे विशेष बुलावे पर
मेरी शादी में आया था नरिया,
मेरी शहरी और अनभिज्ञ पत्नी ने
उसके पाँव छू दिये तो
पूरा गाँव उसे घूरने और उलाहने लगा :
‘रे क्यों आ गया ब्राह्मणों के पवित्र काम काज में!
नीयत पड़ने लगी है अब तुम्हारी पके हुए अनाज में’

माँ ने आदेश दिया....
बहू को तुरंत नहाने का
कपड़े बदलकर मंदिर में जाने का
फिर पंडित ने शुद्धि कर्म किया
'गंगाजल और गौमूत्र' से
वधू को पवित्र किया !

मैं भी व्यवस्था का लाचार अंग-सा
बस देखता ही रह गया
कुछ न कर सका
बल्कि मेरे भीतर का क्षणिक फासीवाद तो
यहाँ तक कहने लगा
कि खामोखां ही बुला बैठा कमबख्त नरिया को।

पर मेरी स्मृति का अभिन्न हिस्सा है नरिया
मेरा प्रिय और सच्चा मित्र है
मेरे चाचा दादा और ताऊ सा ही है
फिर भी मेरे समाज का अछूत ही है नरिया !!

जो सम्मान मेरे दादा का था गाँव में
वही नरिया को दे दो,
फिर वापस ले लो
इसके बच्चों से आरक्षण,
वरना लेने दो इसे
अगली अनेक पुस्तों तक आरक्षण ॥

तमाम आत्ममुग्ध सवर्णो और
स्वघोषित प्रतिभाशालियों !
अभी तो इसे एक सम्मानित इंसान बनने में ही
सदियाँ लग जाएंगी।
फिर ये भी होने लगेगा तुम्हारी ही तरह
टैलेंटेड और कैपेबल !!

No comments:

Post a Comment