Saturday, 17 October 2015

गरीबी: एक अभिशाप

अपने भूखे बिलखते दुधमुँहें बच्चे को
पाँच साल की बेटी के हाथों में सौंपकर,
'मोतिया' भरी दुपहरी में गारा बना रही थी,
धूप उसके सलोने गात को करिया रही थी।
नन्हे बचवा की विटामिन डी की कमी पुरिया रही थी!

आदमी औरत दोनों जमे हैं
रेत सीमेंट का गारा बनाने में,
बीच वाली तीसरी बेटी मिटटी खाने में
और बड़ी वाली माँ-सी बचवा खिलाने में।

किसी तरह पूरा न कर पा रहा
जूझता बेबस परिवार
समय और समाज के हाथों लाचार
कर रहा अपनी रूह पर अत्याचार।

अचानक बादलों की गर्जना में हो सवार
हर तरफ बाढ़ का पानी बहने लगा अपार
बेघर होना ही था मोतिया का परिवार
एक दो नहीं, दिन हो गए पूरे इग्यार। 

भूख से बिलबिलाते बच्चों की
चीख सुनके भी नहीं पिघला ठेकेदार !
बोला गर मरो तो तुम मरो पर
मैं न दूंगा एक नया पैसा उधार!!

भूख के मारे जहर खाकर सो गया पूरा परिवार....
और बाढ़ के खाते में चढ़ गया ये नरसंहार....!
सो रहा विलायती रम के.......
............................   धुत नशे में ठेकेदार
कर रहा पर मन लगाकर नेताजी का वो प्रचार।।


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