Friday, 3 April 2020

मुर्दा आदम

महामारी से बचने को
कोई ताली बजा रहा था,
कोई थाली बजा रहा था.. 
तो कोई दीये जला रहा था।

धरती कांप रही थी, 
आसमान रो रहा था!
मौत के खौफ से..हर कोई 
भयभीत हो रहा था। 

सामने सूखे पत्तों की मानिंद,
यूरोप जल रहा था, 
पूरब तब भी मगर 
वोटों की खेती कर रहा था। 

ताली बज गई,
थाली फट गई!
दीये बुझ गए!!
दौड़ते भागते रास्ते...अचानक रुक गए!!!

अज्ञान और घृणा के अंधकार में, 
समरसता अस्त हो गई! 
लोगों को आपस में लड़ा कर, 
राजनीति मदमस्त हो गई।

सूने हो गए शहर..
लहूलुहान हुई गलियां सारी, 
नफरत के जहर के आगे.. 
छोटी पड़ गई महामारी!!

 अब न तो डॉक्टर की और न ही वैन्टिलेटर की
जरूरत थी, जिंदगी बचाने को। 
दो गज जमीन और चंद लकड़ियां ही काफी थी 
'मुर्दा आदम' को ठिकाने लगाने को!!


'मशालमैन' 

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