सड़कें वीरान और सुनसान थी;
पुलिस किसी तरह सिस्टम को काबू किए थी;
उधर डॉक्टरों की टीम घर-घर जाकर,
बचाव की कवायद कर रही थी;
देश की आवाम घरों में बैठकर
सब की सलामती की इबादत कर रही थी।
मगर उसी वक्त जमातियों की अन्धता व अज्ञानता;
और धर्मोन्मादियों अफवाह फैलाने वाली टोली,
समाज में नफरत का जहर भर रही थी!
समाज को तोड़ने की नापाक कोशिश कर रही थी।
असुरक्षा, अज्ञानता और अफवाहों के तेल में
नफरत के दीये जल रहे थे।
एक तरफ लोग कोरोना से मर रहे थे
दूसरी तरफ हम सांप्रदायिकता से लड़ रहे थे।
डॉक्टरों की टीम पर हुआ पथराव
इसी का एक अभूतपूर्व प्रतिकार था;
वरना इतिहास में ना हुआ
कभी ऐसा कायराना वार था!
सबकी जान बचाने वाला भगवान ही हुआ
इस जहर का शिकार था।
अब दुश्मन केवल वायरस नहीं
बल्कि कई और दीख रहे थे;
अज्ञानता, असुरक्षा, नफरत और
सांप्रदायिकता जैसे दानव,
भारत मां का हृदय चीर रहे थे।
जरूरत सोशल डिस्टेंसिंग की थी..
मगर तुमने दिलों में डिस्टेंस कर दी!
जब वक्त था साथ मिलकर वायरस से लड़ने का!
तुमने वायरस से मिलकर
मानवता के खिलाफ ही साजिश रच दी!!
ऐ नफरत के सौदागरो, ठहर जाओ!
क्योंकि जब जंगल में आग लगेगी तो
पेड़ सूखा भी जलेगा और हरा भी जलेगा।
बच्चा भी जलेगा और बूढ़ा भी जलेगा।
इस आग में रंग नारंगी भी जलेगा,
और हरा भी जलेगा।
आदमी छोटा भी जलेगा और बड़ा भी जलेगा।।
इसलिये ठहर जाओ... ठहर जाओ...!
मशाल मैन
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