महामारी में, जल गया घर उनका!
घर क्या जला , गांव ही जल गया
सपने ही न जले..
सपनों का महल भी जल गया।
कोरोना के कहर से लड़ने को
हर कोई घर में बंद था,
पर घर ही जल गया हो जिनका
उनका क्या प्रबंध था??
सहसा लगी भीषण आग में
बेघर हो गया पूरा गांव!
वैशाख की तपती धूप में
ढह गई उनके सिर की छांव!
एक ओर महामारी है,
एक ओर आग का कहर है
अंगारों में धधक रहा,
सपनों का शहर है
पर सपनों को न जलने देना..!!
कि बसते हैं सपनों से ही नए गांव!
सपनों से ही बसता हर शहर है!!
और कितना ही आलीशान क्यों ना हो..
दफन होता हर शहर है!
मातम पर ही सृजन की,
इबारत लिखी जाती है।
देखो..! जलने ना देना अपने हौसलों को
कि.. हौसलों से ही तो, दुनिया जीती जाती है।
जो आज है वो कल न था
और जो आज नहीं, वो कल होगा..
तेरी उम्मीदों में कैद है, तस्वीर नये कल की!
तेरे आज से कहीं बेहतर, तेरा कल होगा!!
मशाल मैन
उत्तरकाशी के सवादी गांव में लगी भीषण आग के पीड़ितों को समर्पित।
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