तुम्हारे घर बनाता हूं, मैं अपने पसीने से।
तुम्हारी नींव को छत पर चढ़ा देता हूं जीने से
कि तपती धूप में जलकर महल सबके बनाकर भी
मैं बाहर आ नहीं पाता हूं, उस छप्पर पुराने से!!
मैं वो हूं जो पुलों के टूटने पर दबके मरता हूँ !
कभी मैं बाढ़ के पानी में अपनों संग बहता हूँ !
नहीं मिलता सुकूं मुझको, कभी ताउम्र दुनिया में!
कभी गर्मी से जलता हूँ ! कभी सर्दी से मरता हूँ!!
कि सरपट दौड़ते हो जिनपे, वो सड़कें बनाता हूं
हजारों मील अपने गाँव, पर पैदल ही..जाता हूँ
मुझे क्या धौंस देते हो! तुम्हारी रेलगाड़ी की
मैं ही पटरी बिछाता हूं, मैं ही पटरी पे आता हूं!!
बड़ी आशाओं से तुमको, मैं गद्दी पर बिठाता हूं।
मगर हर बार ही खुद को, ठगा हुआ सा पाता हूं।
कि बचकर मुझ गरीबा से, कहां जाओगे ओ शाहो!
मैं जो डोली उठाता हूं! तो अर्थी भी उठाता हूं!!
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