नासिक से सतना जावे थी वो, पैदल अपने गांव!
अपने मटमैले आंचल से, दे रही गर्भ को छांव!
चल रही धूप में बिना रुके, जल्दी पहुंचूं मैं गांव।
शिशु ने आहट दी आने की, थम गए अचानक पाँव।
प्रसव वेदना से चिल्लाई, ना था कोई सुनने वाला
उस गरीब दुखियारी की, पीड़ा को हरने वाला!
बच्चा जना सड़क पर माँ ने! अश्रु धार थी फूटी..
घबराहट में शिशु के जीवन की, आशा भी थी टूटी
किंतु लाल था हिम्मतवाला, जरा देर ही रोया!
मां के मटमैले आंचल से, उसने था मुंह धोया!
माँ थी भूखी प्यासी लेकिन, ममता का दर्द हरा था..
दुग्ध धार फूटी स्तनों से, बालक का पेट भरा था।
एक नुकीले पत्थर से फिर, जन्म नाल थी काटी!
अपने बालक की नाभी, उसने जिह्वा से चाटी!!
बेहोशी आयी अखियन में, पर माता तनिक न सोई
इसीलिए तो वंदनीय है, ना माता सा कोई !
उठा बांध चुनरी से शिशु को, चल दी माता अभिमानी!
ललना को पिलवाने उसकी, पितृभूमि का पानी।
बड़ी दूर थी मंजिल उसकी, सौ-सौ चलने थे मील!
मरदानी मां की छाया को, संग-संग उड़ते थे चील!
पक्षी कलरव करते थे, वह लगती थी सेनानी!
पद चापों से धन्य हो रही, धरती हिंदुस्तानी!!
छाती से बांधे बालक को, जो मीलों दूर चली थी;
एक मूर्ति लगा दो संसद में! उस माता महाबली की!
और नहीं है यह कोई, यह ही तो भारत माँ है
इसका पूजन वंदन कर लो, ऐसा फिर पुण्य कहां है!
मंचों से जय-जय करने से, बस राजनीति ही होगी!
भारत मां की सच्ची जय तो, इस मां की जय ही होगी!
ऐसी कितनी ही भारत माँ, जब मरती है सड़कों पे!
सोया रहता है एक भारत, तब अपने ऊंचे महलों में!
जागो भारत बुला रही है! तुमको भारत माता।
सड़कों पर हो रहा प्रसव भी, क्या तुमको जगा न पाता?
मशालमैन
No comments:
Post a Comment