Tuesday, 26 May 2020

दलितों की यलगार

अरे गजब हो गया 'कमल'!
दलितों का आंदोलन हो गया. 
सदियों से कुचला जा रहा था जो,
सर नीचे करके ही चला करता था जो, 
जल, जंगल, जमीन सब से बेदखल था जो,
वह उठ खड़ा हुआ! 
उसने आवाज उठा दी!
उसने देहलीज पार कर दी!
उसने आंदोलन कर दिया.

अरे मालूम है तुमको  
जिसकी झोपड़ियां जलाया करते थे जमींदार,
सरेआम बसें फूंक दी उसने!
पंडितजी छूने से भी कतराते थे जिसे,
उस ने सरेआम सड़क पर 
उनकी झूठी आबरु को नंगा कर दिया.
अरे गजब हो गया,
दलितों का आंदोलन हो गया!

यूं तो हिंसा हो या आगजनी 
कभी काबिल-ए-तारीफ नहीं हो सकती.
मगर यह विद्रोह... 
एक नई मिसाल है!
शुरुआत है एक नए इतिहास की!
यह पुराने प्रतीकों की हार और 
नए दौर को गढ़े जाने के 
उन्माद का एहसास है.

पर यकीन मानिए, ये तो बस 
गूंगे के रोने की आवाज है,
'यलगार' अभी होना बाकी है
'कमल' ये तो बस आगाज़ है!

'मशालमैन'

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