सुनने में आया है कि कोर्ट ने भीख मांगने को अपराध की श्रेणी में मानने से इनकार कर दिया है. वैसे हमारे विचार से भीख मांगने में इंसान को कोई मजा नहीं आता होगा. कोई भी इंसान मजबूरी में ही भीख मांगता होगा. फिर दूसरी बात यह है कि भीख मांगना कोई इतना आसान काम तो नहीं भाई! भीख मांगने के लिए भी तो मेहनत करनी पड़ती है. दोपहर की धूप में चौमांस की बारिश में, कड़ाके की सर्दी में, शरीर पर बगैर कपड़ों के इधर से उधर घूमना और हर आते-जाते आदमी के आगे हाथ फैलाना, क्या यह कम मेहनत का काम है??
फिर हमारे देश में तो भीख मांगने को बड़ी ऊंची मान्यता है. आज से नहीं बल्कि सदियों से हमारे यहां साधु संन्यासी लगातार बड़े गर्व के साथ भीख मांगते चले आ रहे हैं. गाहे-बगाहे शादी बारातों में चले आने वाले पंडित जी का भी तो इनडायरेक्टली यही काम है. इन सबसे ऊपर एक बात यह भी है कि आखिर कौन भीख नहीं मांग रहा है इस दुनिया में??? हर आदमी तो भीख मांगी रहा है! नेता, जनता से वोट की भीख मांग रहा है और जनता नेता से अधिकार मांग रही है, थोड़ा बहुत काम भी मांग रही है ताकि उसे सड़क पर भीख ना मांगनी पड़े! ऑफिसों में देख लीजिए कर्मचारी, अधिकारियों से प्रमोशन मांग रहे हैं और अधिकारी-कर्मचारी से दुनिया भर का काम मांग रहे हैं, करने लायक भी और ना करने लायक भी! ऐसे में भला भीख मांगने को अपराध ठहराया जाना ठीक भी नहीं था. कोर्ट ने जो फैसला लिया है सही ही लिया है!
अरे भाई! भूखे-प्यासे मरने से अच्छा तो भीख मांगना है ही! और भिखारी क्या अपराध करता है? दिन भर मेहनत करता है, बेचारा सड़कों पर मारा मारा फिरता है. कभी इस मोड़ से उस मोड़ तो कभी इस रेड लाइट से उस रेड लाइट और कभी इस चौराहे से उस चौराहे. कभी इस गाड़ी के आगे तो कभी उस गाड़ी के आगे और मजे की बात देखिए कि सौ लोगों के भीख ना देने के बाद भी वह एक सौ एकवें आदमी के आगे उसी अधिकार, उसी साहस और उसी पुरुषार्थ के साथ हाथ फैलाता है. आखिर इसके बदले में उसको कुछ तो मिलना ही चाहिए.
इतना चलना फिरने के कारण भिखारी को कभी डायबिटीज को नहीं होता पर फिर भी उसे स्वास्थ्य बीमा तो कराना ही पड़ता है क्योंकि कुछ हो या ना हो पर उसे कैंसर जरूर हो सकता है. वह चलते फिरते तंबाकू, बीड़ी और गुटखा वगैरा तो खाता ही रहता है, और कभी कभार शाम को 100 -200 रुपए क्वार्टर पर भी खर्च कर लेता है. लोग शराब की दुकान पर खड़े किसी भिखारी को बड़ी बुरी नजर से देखते हैं और कहते हैं "यह देखो! यहीं खड़ा होकर दिनभर हमसे भीख मांगता है और रात को शराब की दुकान पर हमारे सामने हमसे अच्छी शराब खरीदता है!" पर एक बात सोचिए जब हम लोग नॉर्मल रूटीन वाले ऑफिस में वह भी एयर कंडीशन में बैठकर टेंशन में आ जाते हैं और शाम को दो पैग लगाने से पीछे नहीं हटते तो दिन भर धूप में धक्के खाने वाला, दर-दर की ठोकरें खाने वाला भिखारी..! उसे कितना टेंशन होता होगा? अगर वह कभी कबार बल्कि यूं कहिए कि अगर रोज भी एक क्वाटर पी ले रहा है तो इसे गलत नहीं समझा जाना चाहिए भाई!
भिखारियों पर उंगली उठाने वाले बुद्धिजीवी और ज्ञानी लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भिखारी हमारी संस्कृति हैं. भिखारियों को हमने सदियों से पनाह दी है. और जिस तरह हमारे देश में रोजगार की निरंतर कमी हो रही है उसे देखते हुए हमें भविष्य में भी भिखारियों को ना केवल बर्दाश्त करना पड़ेगा बल्कि भीख मांगने को एक प्रोफेशन के रूप में भी मान्यता देनी पड़ेगी. इसलिए हमें कोर्ट के फैसले की गहराई को समझना चाहिए और भीख मांगने को हमारे समाज का एक अनिवार्य पहलू मान लेना चाहिए. आखिर राहु केतु और शनि मंगल की दशाओं से बचाव करने के लिए इन भिखारियों की भूमिका कुछ कम तो नहीं है! इसी बहाने सही, कुछ लोग भूखे मरने से तो बच रहे हैं, वरना यहां किसे पड़ी है गरीब जनता की..!
मशाल मैन
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